खुशियों में साथ दिया,
जब ग़म थे लापता।
ग़म में भी दिया साथ,
बिना मांगे कभी-कभी।
दूर होंगे जब गिने -
कितने समुद्रों की दूरी में हैं हम
मेरे मन में तो इतने दूर न हो तुम ।
उलझे हुए मेरे अनगिनत ख़यालों की जालियों में -
कभी ज़्यादा, कभी कम जगह ली है तुमने ,
मगर एक हिस्सा पक्का तुमने ही लिया है, दोस्त मेरे।
ज़िंदगी की दौड़ में दोस्ती को पीछे रखा होगा,
शायद मैंने ।
लेकिन सोच यही थी कि -
पीछे जाकर भी उसी दोस्ती को ,
आगे ले पाऊंगी जब चाहूंगी तब।
वक़्त को वक़्त दे रही हूं अभी सुलझने के लिए।
माफ़ करना ए दोस्त—
अगर ये सोच तुम तक न पहुंची हो,
ये ज़रूर याद रखना:
मैं पीछे तो ज़रूर आऊंगी,
तुम दूरी बनाओ तब भी।
Won't leave-u-ingly,
An.
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