Friday, July 4, 2025

दूर फिर भी पास....

 खुशियों में साथ दिया,

जब ग़म थे लापता।

ग़म में भी दिया साथ,

बिना मांगे कभी-कभी।

दूर होंगे जब गिने - 

कितने समुद्रों की दूरी में हैं हम

मेरे मन में तो इतने दूर न हो तुम ।

उलझे हुए मेरे अनगिनत ख़यालों की जालियों में -

कभी ज़्यादा, कभी कम जगह ली है तुमने ,

मगर एक हिस्सा पक्का तुमने ही लिया है, दोस्त मेरे।

ज़िंदगी की दौड़ में दोस्ती को पीछे रखा होगा,

शायद मैंने ।

लेकिन सोच यही थी कि -

पीछे जाकर भी उसी दोस्ती को , 

आगे ले पाऊंगी जब चाहूंगी तब।

वक़्त को वक़्त दे रही हूं अभी सुलझने के लिए।

माफ़ करना ए दोस्त—

अगर ये सोच तुम तक न पहुंची हो,

ये ज़रूर याद रखना:

मैं पीछे तो ज़रूर आऊंगी,

तुम दूरी बनाओ तब भी।

Won't leave-u-ingly,

An.

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