Monday, June 22, 2020

मृगतृषा




कभी गहराईयों में झांककर देखी नहीं खुद को,
जो लोग कहते, वही मान लेती थी खुद को।
जो हूँ वो और जो न हूँ, वो भी...

यूँ ही चला वक़्त हमेशा की तरह,
इंतज़ार न करते हुए किसी के...

वक़्त को कुछ वक़्त दिया तो,
ले आया वो मुझे खुद से, खुद के करीब।
समझने लगी खुद को, खुद की नज़र से अब,
उन गहराईयों में झांककर देखने लगी तब से...

जो भी थी मैं सबकी नज़रों में,
थी ही न मैं वो – शायद।
मेरी हँसी में छुपा दर्द न समझ पाए वो,
मेरे आँसू में भरी ख़ुशी ना समझ पाए वो।

शायद गलत थे नहीं कोई...
मैंने जो दिखाया, वही सच समझे वो।
जो गहरे थे, कह न पाई मैं कभी...
ना ही खुद समझ पाए वो कभी...

Mirage-ify-ingly,

An.














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